डोनाल्ड ट्रम्प की वापसी अमेरिका और पूरी दुनिया के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण हो सकती है। उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान, अमेरिका के घरेलू और विदेश नीति में बदलाव की संभावना है, खासकर जब बात बेरोजगारी, शरणार्थी संकट और विदेशों में संघर्षों की हो।
चीन के साथ ट्रम्प की नीति पर भी ध्यान केंद्रित किया जाएगा। पहले कार्यकाल में ट्रम्प ने रूस के प्रति एक लचीला रुख अपनाया था, लेकिन उनकी वापसी से यह सवाल उठता है कि क्या वे यूक्रेन युद्ध में मध्यस्थता करेंगे और अगर करेंगे तो क्या वह रूस को समर्थन देंगे। चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और यूरोप में चीन की बढ़ती घुसपैठ पर भी उनके फैसले वैश्विक प्रभाव डाल सकते हैं।
रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा संबंधों के संदर्भ में ट्रम्प की नीतियाँ NATO को कमजोर कर सकती हैं, जिससे यूरोप की सुरक्षा और राजनीति पर असर पड़ेगा।
इन दलीलों से यह समझा जा सकता है कि ट्रम्प की वापसी वैश्विक राजनीति में
अनिश्चितता और तनाव को जन्म दे सकती है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में उन्हें नये सहयोगियों और समझौतों
के रूप में सफलता भी मिल सकती है।
विश्व के नेता और कूटनीतिज्ञ ट्रम्प के इस दुसरे कार्यकाल को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देंगे, जिनमें से कुछ उन्हें विश्व शांति के लिए खतरा मान सकते हैं, जबकि अन्य उन्हें एक सशक्त और सीधा दृष्टिकोण अपनाने वाला नेता मान सकते हैं।
डोनाल्ड ट्रम्प की वापसी पर अमेरिका और विश्व में मिश्रित
प्रतिक्रियाएं हैं। अमेरिका में ट्रम्प के समर्थकों के लिए वह देश के लिए कठोर
निर्णय लेने वाले नेता हैं, जो अमेरिकी आर्थिक हितों को प्राथमिकता
देंगे, खासकर व्यापार, सीमा सुरक्षा, और गैरकानूनी प्रवासन पर उनके रुख के
चलते। दूसरी ओर, ट्रम्प के विरोधियों को उनकी नीतियों से
वैश्विक स्थिरता पर खतरा महसूस होता है, खासकर अमेरिका की वैश्विक संस्थानों और मित्र देशों के साथ
संबंधों में।
ट्रम्प की विदेश नीति में रूस और चीन के प्रति लचीला रुख
दिखाया गया था। रूस के प्रति ट्रम्प का नरम रुख यूरोप को असहज करता है, क्योंकि यूरोपीय देश अमेरिका पर अपनी
सुरक्षा के लिए निर्भर हैं, खासकर पूर्वी यूरोप में बढ़ते रूस के
प्रभाव को देखते हुए। ऐसे में ट्रम्प की संभावित वापसी यूरोप में सुरक्षा को लेकर
चिंता का कारण बन सकती है, क्योंकि यूरोप के कई विशेषज्ञ मानते हैं
कि ट्रम्प का वापसी का रुख उन्हें रूस के साथ समझौता करने की ओर ले जा सकता है, जिससे यूक्रेन और अन्य छोटे यूरोपीय
देशों पर दबाव बढ़ेगा।
डोनाल्ड ट्रम्प की वापसी पर अमेरिका और विश्व में मिश्रित प्रतिक्रियाएं हैं। अमेरिका में ट्रम्प के समर्थकों के लिए वह देश के लिए कठोर निर्णय लेने वाले नेता हैं, जो अमेरिकी आर्थिक हितों को प्राथमिकता देंगे, खासकर व्यापार, सीमा सुरक्षा, और गैरकानूनी प्रवासन पर उनके रुख के चलते। दूसरी ओर, ट्रम्प के विरोधियों को उनकी नीतियों से वैश्विक स्थिरता पर खतरा महसूस होता है, खासकर अमेरिका की वैश्विक संस्थानों और मित्र देशों के साथ संबंधों में।
ट्रम्प की विदेश नीति में रूस और चीन के प्रति लचीला रुख दिखाया गया था। रूस के प्रति ट्रम्प का नरम रुख यूरोप को असहज करता है, क्योंकि यूरोपीय देश अमेरिका पर अपनी सुरक्षा के लिए निर्भर हैं, खासकर पूर्वी यूरोप में बढ़ते रूस के प्रभाव को देखते हुए। ऐसे में ट्रम्प की संभावित वापसी यूरोप में सुरक्षा को लेकर चिंता का कारण बन सकती है, क्योंकि यूरोप के कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रम्प का वापसी का रुख उन्हें रूस के साथ समझौता करने की ओर ले जा सकता है, जिससे यूक्रेन और अन्य छोटे यूरोपीय देशों पर दबाव बढ़ेगा।
मध्य-पूर्व में, ट्रम्प प्रशासन ने इजराइल का पुरजोर समर्थन किया, जो अमेरिका का एक महत्वपूर्ण सहयोगी है। ईरान के साथ अमेरिका के तनावपूर्ण संबंधों को ट्रम्प ने और बढ़ाया था, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता पर असर पड़ा। यदि ट्रम्प फिर से आते हैं, तो यह संभव है कि वह ईरान पर प्रतिबंधों और इजराइल के समर्थन को और मजबूत करेंगे, जो इस क्षेत्र में संघर्ष को और बढ़ा सकता है। लेबनान और अन्य मध्य-पूर्वी देशों के साथ इजराइल के तनावपूर्ण संबंधों में भी यह बदलाव दिख सकता है।
चीन के बढ़ते प्रभाव से अमेरिका और यूरोप के देशों में चिंताएं हैं, और ट्रम्प की संभावित नीतियां अमेरिका को अधिक घरेलू और व्यापारिक सुरक्षा की ओर ले जा सकती हैं, जिससे यूरोप को अपने सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने पर अधिक ध्यान देना होगा। ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका का एकाकी रुख यूरोप को मजबूर करेगा कि वह अपने बचाव के लिए स्वयं खड़ा हो।
इस प्रकार, वैश्विक दृष्टिकोण से ट्रम्प की वापसी अमेरिका और दुनिया के भविष्य के लिए गहरी असर डाल सकती है, क्योंकि उनके रुख में अक्सर विवादास्पद और उग्र विचार होते हैं, जो वर्तमान विश्व संरचना को चुनौती देने का प्रयास करते हैं।
विश्व के कई प्रमुख मीडिया संस्थानों और संपादकों के
विचारों में, डोनाल्ड ट्रम्प की संभावित वापसी और इसके
प्रभाव पर गहरी चिंताएं उभर रही हैं। यूरोप में कई देशों की सरकारें उनके संभावित
कार्यकाल को लेकर चिंतित हैं, विशेषकर नाटो और
यूक्रेन के संदर्भ में। ट्रम्प की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति और रूसी संबंधों को लेकर उनकी
नीतियों से यूरोपीय देशों को नाटो में रक्षा योगदान बढ़ाने का दबाव आ सकता है।
जर्मनी, जो अतीत में ट्रम्प के लक्ष्यों में एक
प्रमुख देश रहा है, अब अपने सैन्य खर्च को गंभीरता से ले रहा
है, ताकि भविष्य में अमेरिका द्वारा संभावित
समर्थन कटौती से स्वयं को बचा सके
चीन के दृष्टिकोण से, ट्रम्प की वापसी से व्यापार और रणनीतिक संबंधों में तनाव बढ़ सकता है। ट्रम्प के कार्यकाल में लगाए गए कई टैरिफ अब भी कायम हैं, और उनका दोबारा चुनाव से चीन के खिलाफ कठोर नीति जारी रह सकती है। हालांकि कुछ व्यापार समर्थक समूह ट्रम्प को इस कठोर नीति में ढील देने के लिए भी प्रभावित कर सकते हैं
दक्षिण अमेरिकी देशों, जैसे ब्राजील, में ट्रम्प की वापसी के संभावित प्रभाव को लेकर चिंताएं हैं। ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा द्वारा निर्धारित जलवायु और गरीबी उन्मूलन के एजेंडे पर ट्रम्प की नीतियों का प्रभाव पड़ सकता है। इसी प्रकार, इटली जैसे अन्य देशों के लिए भी यह एक उलझन है, जो बाइडेन के साथ मजबूत रिश्तों को बनाए रखना चाहते हैं लेकिन ट्रम्प का समर्थन कर चुके हैं ।
कुल मिलाकर, ट्रम्प की संभावित वापसी से वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक मंच
पर व्यापक बदलाव की संभावनाएं हैं, विशेषकर यूरोप और एशिया के दृष्टिकोण से, जहाँ कई देशों की सरकारें अपनी सुरक्षा, व्यापार, और सहयोगी संबंधों को लेकर रणनीति बना रही हैं।
वर्तमान में प्रमुख वैश्विक कूटनीतिज्ञों के बीच डोनाल्ड
ट्रंप की संभावित वापसी को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ हैं, जिनमें चिंताओं के साथ-साथ अवसर की भी
चर्चा हो रही है। यूरोप के अधिकांश देशों, विशेषकर नाटो (NATO) सदस्यों और यूरोपीय संघ (EU) के नीति-निर्माताओं में इस बात का डर है कि ट्रंप के
नेतृत्व में अमेरिका के साथ गठबंधन कमज़ोर हो सकता है। पिछले कार्यकाल में ट्रंप
ने नाटो को लेकर कठोर रुख अपनाया था और यूरोप में अमेरिका की भूमिका को घटाने के
संकेत दिए थे। यूरोपीय देशों में डर है कि ट्रंप का पुनः चुनाव गठबंधन में विघटन
ला सकता है, जिससे रूस और चीन जैसे विरोधी देश यूरोप
पर अपनी पकड़ बढ़ा सकते हैं। वहीं, कुछ यूरोपीय नीति-निर्माताओं का मानना है कि ट्रंप की वापसी
से अमेरिका-यूरोप के बीच व्यापारिक संबंधों में कठिनाइयाँ बढ़ेंगी, विशेष रूप से व्यापार संधियों और
पर्यावरणीय नीति पर असहमति के कारण।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में जापान और दक्षिण कोरिया जैसे
अमेरिका के सहयोगी ट्रंप की वापसी से चिंतित हैं कि उनके पिछले कार्यकाल जैसी
अनिश्चितता से सुरक्षा साझेदारी प्रभावित हो सकती है। इन देशों में भी ट्रंप की
नीतियों को लेकर आशंका है कि वे क्षेत्रीय स्थिरता को कमजोर कर सकते हैं। इसके
विपरीत, चीन और रूस जैसे देश ट्रंप की वापसी को
एक अवसर के रूप में देख रहे हैं, जहाँ वे अमेरिकी
नेतृत्व वाले गठबंधनों में अंतराल का फायदा उठाकर अपनी स्थिति को सुदृढ़ कर सकते
हैं। ट्रंप की विदेश नीति में व्यापार और सैन्य संधियों पर उनकी सख्ती ने अमेरिका
को प्रतिस्पर्धा से पीछे छोड़ दिया था, जिसका लाभ चीन और रूस ने उठाया था।
रूस के लिए, खासकर यूक्रेन में चल रहे संघर्ष के संदर्भ में, ट्रंप की वापसी के संभावित परिणाम
महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। यह आशा की जा रही है कि उनके नेतृत्व में अमेरिका
यूक्रेन को समर्थन देना कम कर सकता है, जिससे रूस को एक रणनीतिक लाभ मिलेगा। चीन के
नीति-निर्माताओं में भी यह उम्मीद है कि ट्रंप के कारण अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा
में थोड़ी शिथिलता आएगी, जिससे उन्हें दक्षिण-पूर्व एशिया में
अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिलेगा।
इस प्रकार, प्रमुख कूटनीतिज्ञों की राय मिलीजुली है—यूरोप, जापान और दक्षिण कोरिया के सहयोगियों में जहाँ आशंका और चिंता है, वहीं चीन और रूस के रणनीतिकार ट्रंप की वापसी को एक अवसर के रूप में देख रहे हैं।
2024 के अमेरिकी चुनावों में डोनाल्ड ट्रम्प की जीत के बाद, अमेरिकी मीडिया में विभिन्न प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। कई अखबारों और मीडिया आउटलेट्स ने ट्रम्प की जीत को अमेरिकी लोकतंत्र के लिए एक गहरी चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया। न्यू यॉर्क टाइम्स ने इस नतीजे को "गहरे विभाजन" और "लोकतांत्रिक संस्थानों के लिए खतरा" के रूप में बताया, जबकि वैनिटी फेयर ने ट्रम्प के "अधिनायकवादी" बयानबाजी पर चिंता जताई, जिसमें उन्होंने अपने विरोधियों को दंडित करने की बात कही थी। ट्रम्प ने अभियान के दौरान न्याय विभाग और अन्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया, जो उनके अनुयायियों में अधिक उत्साह का कारण बना।
वहीं, वॉशिंगटन पोस्ट ने इस जीत के बाद ट्रम्प समर्थकों द्वारा सोशल मीडिया पर अत्यधिक उग्र प्रतिक्रिया का उल्लेख किया, जिनमें नस्लीय और लिंग आधारित भेदभाव के संकेत मिले। वायर्ड ने देखा कि उनके कई समर्थकों ने सोशल मीडिया पर महिलाओं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसक और अत्यधिक आक्रामक भाषा का प्रयोग किया, जो देश में विभाजन को और गहरा कर सकता है।
इसके अलावा, अटलांटिक और एनपीआर जैसे अन्य मीडिया आउटलेट्स ने भी ट्रम्प के सत्ता में लौटने के संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई है, खासकर उनकी योजनाओं को लेकर, जिनमें अप्रवासी नीति, व्यापारिक शुल्क और नाटो से संभावित अलगाव जैसे मुद्दे शामिल हैं। ऐसे में अमेरिकी मीडिया में ट्रम्प की वापसी को लेकर गहन चिंतन और आलोचना का माहौल है।
यह प्रतिक्रियाएँ दर्शाती हैं कि ट्रम्प की जीत पर अमेरिकी मीडिया में विशेषकर लोकतंत्र और सामाजिक स्थिरता के भविष्य को लेकर गहरी आशंकाएँ हैं।
अमेरिका में रक्षा और अंतरिक्ष नीति में महत्वपूर्ण
परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं, विशेष रूप से वर्तमान और भविष्य के रक्षा
बजट और सुरक्षा प्राथमिकताओं के संबंध में। बाइडन प्रशासन ने हाल ही में 2024 के लिए लगभग $874 बिलियन का रक्षा बजट पास किया, जो कि चीन और रूस जैसी वैश्विक शक्तियों
के साथ प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के साथ-साथ इज़राइल और ताइवान जैसे मित्र देशों की
सुरक्षा सहायता पर भी केंद्रित है। रक्षा नीति में यह बजट हथियार प्रणाली के
विस्तार, साइबर सुरक्षा, और अंतरिक्ष सुरक्षा के लिए समर्पित है, जिसमें विभिन्न नए हथियार और रक्षा उपकरण
सम्मिलित किए गए हैं, जैसे कि टोमहॉक क्रूज मिसाइल और अन्य
आधुनिक म्यूनिशन सिस्टम्स।
अंतरिक्ष नीति में, विशेष रूप से यूएस स्पेस फोर्स की बढ़ती भूमिका के मद्देनजर, अमेरिका 2026 तक अपने अंतरिक्ष प्रोग्राम्स को युद्ध-तैयार बनाने की ओर
अग्रसर है। इस नीति का उद्देश्य अमेरिका की अंतरिक्ष सुरक्षा को सुदृढ़ करना है, खासकर चीन और रूस की ओर से अंतरिक्ष में
बढ़ते खतरे के जवाब में।
भविष्य की नीतियों में, डोनाल्ड ट्रम्प की संभावित वापसी या कांग्रेस में रिपब्लिकन बहुमत के आने पर रक्षा खर्च में और वृद्धि की संभावना जताई जा रही है, खासकर कि हथियार उद्योग में। वर्तमान स्थिति में रक्षा और अंतरिक्ष नीतियों को मजबूत करना और घरेलू उद्योगों को विकसित करना प्राथमिकताएँ बनी हुई हैं, जिससे अमेरिका अपनी वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का मुकाबला कर सके।
ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका का एशिया में भारत, चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव और उत्तर
कोरिया की गतिविधियों के प्रति रुख "Peace Through Strength" (शक्ति के माध्यम से शांति) सिद्धांत पर
आधारित रहा। इसका उद्देश्य मित्र देशों को सैन्य और आर्थिक रूप से मजबूत बनाना था
ताकि वे चीन और रूस जैसे देशों के बढ़ते प्रभुत्व का मुकाबला कर सकें। ट्रम्प
प्रशासन ने एशिया में भारत, जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ सामरिक साझेदारी को बढ़ावा
दिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा को प्राथमिकता दी, जिससे एशिया में चीन की आक्रामकता को
नियंत्रित किया जा सके।
उत्तर कोरिया की परमाणु गतिविधियों और मिसाइल परीक्षणों को
ट्रम्प प्रशासन ने कड़े प्रतिबंधों और चीन पर दबाव बनाकर रोकने का प्रयास किया।
ट्रम्प ने व्यक्तिगत रूप से किम जोंग उन के साथ भी कूटनीतिक संवाद स्थापित किया
ताकि उत्तर कोरिया की परमाणु आकांक्षाओं को कूटनीतिक तरीकों से नियंत्रित किया जा
सके, हालांकि यह पूरी तरह सफल नहीं हो सका।
रूस के संदर्भ में, ट्रम्प प्रशासन ने रूस की चीन और उत्तर कोरिया के साथ बढ़ती
नजदीकी पर भी नजर रखी और NATO और अन्य पश्चिमी गठबंधनों को मजबूत किया, जिससे अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को
सुरक्षा मिल सके। ट्रम्प की नीति "अमेरिका फर्स्ट" के आधार पर थी, जिसमें अमेरिका के आर्थिक और सामरिक हित
सर्वोपरि थे।
कुल मिलाकर, ट्रम्प प्रशासन का उद्देश्य एशिया में बढ़ती चुनौतियों के जवाब में सहयोगियों को मजबूत करके और प्रमुख खतरों के खिलाफ सख्त रुख अपनाकर क्षेत्र में संतुलन बनाए रखना था।
डोनाल्ड ट्रम्प की संभावित वापसी के साथ अमेरिका-भारत संबंधों में सुधार की संभावना है, हालांकि कुछ मुद्दों पर मतभेद भी उभर सकते हैं। ट्रम्प के पिछले कार्यकाल में अमेरिका और भारत के बीच रक्षा और रणनीतिक सहयोग में मजबूती आई थी। ट्रम्प प्रशासन ने भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए एक प्रमुख भागीदार के रूप में देखा था, जिससे QUAD जैसे गठबंधन में भारत की भूमिका भी मजबूत हुई।
ट्रम्प के नेतृत्व में फिर से अमेरिका का झुकाव चीन के खिलाफ भारत के समर्थन में रहने की संभावना है, क्योंकि चीन को ट्रम्प एक प्रमुख आर्थिक और सामरिक प्रतिद्वंद्वी मानते रहे हैं। इसके अलावा, डिफेंस सेक्टर में सहयोग और रक्षा उपकरणों की खरीद में भी दोनों देशों के बीच सकारात्मक विकास हो सकता है, खासकर कि भारत अमेरिका से रक्षा उपकरणों का एक बड़ा आयातक है।
हालांकि, कुछ आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों पर दोनों देशों में टकराव हो सकता है। ट्रम्प प्रशासन ने पहले भारत के साथ व्यापारिक संतुलन को लेकर कठोर रुख अपनाया था, और "अमेरिका फर्स्ट" नीति के तहत व्यापार में अमेरिकी हितों को प्राथमिकता दी थी। ट्रम्प की वापसी पर भी इस दिशा में भारत पर दबाव बनाने की संभावना है, जिससे कुछ तनावपूर्ण स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।
कुल मिलाकर, रणनीतिक और रक्षा संबंधों में मजबूती की उम्मीद है, लेकिन व्यापारिक नीतियों पर रुख कठोर भी हो सकता है।
जापान और जर्मनी ट्रम्प की जीत को किस तरह से देख रहे हैं?
जापान और जर्मनी की प्रतिक्रियाएँ ट्रम्प की जीत पर मिश्रित और सतर्क रही हैं। जापान में सुरक्षा और आर्थिक नीतियों को लेकर अनिश्चितता है, क्योंकि ट्रम्प का अधिकतर ध्यान अमेरिका के घरेलू हितों पर होता है और उनकी “अमेरिका फर्स्ट” नीति से जापान की चीन के विरुद्ध रणनीतिक साझेदारी पर प्रभाव पड़ सकता है।
जर्मनी में ट्रम्प की व्यापारिक नीतियों के कारण चिंताएँ हैं, विशेषकर उनके द्वारा चीनी उत्पादों पर प्रस्तावित भारी शुल्क से। इसके अतिरिक्त, ट्रम्प की रूस के प्रति नरम रुख और यूक्रेन संघर्ष में उनकी अनिश्चित नीति ने यूरोप की सुरक्षा स्थिति को जटिल बना दिया है। जर्मन उद्योग और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर भी ट्रम्प की स्थिति को लेकर संदेह बरकरार है।
ज्यादातर यूरोपियन देशों की चिंता गैस की निरंतर व अवाध आपूर्ति को लेकर रहती है, जिसका कि प्रमुख सप्लायर रूस है। ऐसे में अमेरिका इस मामले को किस तरह से देखेगा?
यूरोप की गैस आपूर्ति को लेकर ट्रम्प प्रशासन संभवतः फिर से रूस पर निर्भरता को कम करने की दिशा में कदम उठाएगा, जैसे कि पहले किया गया था। अमेरिका यूरोप को रूस से स्वतंत्र करने के लिए वैकल्पिक ऊर्जा आपूर्तियाँ बढ़ा सकता है, विशेष रूप से अपने स्वयं के प्राकृतिक गैस उत्पादन को बढ़ाकर यूरोप में निर्यात को प्रोत्साहित करेगा। इसके अलावा, यूरोप को अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने के लिए दबाव बढ़ सकता है ताकि रूस-यूक्रेन संघर्ष जैसी स्थिति में ऊर्जा आपूर्ति बाधित न हो।
अरब वर्ल्ड में क्या प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली हैं?
अरब देशों ने डोनाल्ड ट्रम्प की जीत पर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ दी हैं। सऊदी अरब और इज़राइल जैसे देश, जहाँ ट्रम्प के साथ घनिष्ठ संबंध रहे हैं, उनकी वापसी को सकारात्मक मान रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि उनके कार्यकाल में दोनों देशों के साथ सहयोग और बढ़ेगा। सऊदी अरब के राजा और क्राउन प्रिंस ने अमेरिका-सऊदी संबंधों को मजबूत करने की उम्मीद जताई है, जबकि इज़राइल के प्रधानमंत्री ने ट्रम्प की जीत को "नई शुरुआत" कहा है, खासकर ईरान के खिलाफ कठोर नीति की अपेक्षा के साथ ।
हालाँकि, फिलिस्तीन ने अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। फिलिस्तीनी प्राधिकरण के अध्यक्ष ने ट्रम्प को बधाई दी लेकिन क्षेत्रीय शांति में प्रगति की उम्मीद जताई है। वहीं, ईरान और हिज़बुल्लाह जैसी ईरान-समर्थित समूहों में ट्रम्प की वापसी को लेकर असंतोष है, क्योंकि उनके पिछले कार्यकाल में संबंध अत्यंत तनावपूर्ण रहे थे। खैर समय बताएगा कि उनके बारे में सोची समझी गयीं धारणाएँ निर्मूल सिद्ध होंगी या फिर इस सच का सामना भी होगा? हमें समय का इंतज़ार करना चाहिए।
References: -
- Council on Foreign Relations
- BizNews.com
- Council on Foreign Relations The National Interest

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