“साबुन, कीटाणु और हमारा शरीर: क्या हम अनजाने में अपने रक्षक सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर रहे हैं?”
“Soap, germs, and our bodies: Are we unknowingly destroying our protective microorganisms?”
आजकल मार्केट में तमाम तरह के साबुन उपलब्ध हैं नहाने के, जिनमें बढ़िया खुशबूदार एवं स्वास्थ्य को लेकर तमाम दावे होते हैं। यहाँ तक कि जानवरों के नहलाने के लिए भी बाजार में साबुन उपलब्ध हैं। पहले कहा जाता था कि लाइफबॉय साबुन कुत्तों को नहलाने के लिए बना था, जिसे हिंदुस्तान लीवर कंपनी ने भारत में आम लोगों के लिए लॉन्च कर दिया। अब लेकिन अलग स्थिति है और बहुतेरे ब्रांडस के Soap नहाने व धोने के लिए बाजार में उपलब्ध हैं।
भारत में बिकने वाले साबुनों की गुणवत्ता और उनके स्वास्थ्य को लेकर किये जाने वाले दावे हमेशा ही संदिग्ध रहे हैं। क्योंकि यहाँ विभिन्न रूपों में फैला भ्रष्टाचार एवं गुणवत्ता को मापने के लिए मापन की दोषपूर्ण प्रयोगशालाएं एवं संसाधन शुरू से ही दूषित रहे हैं। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी एवं व्यपार जगत में फैला करप्शन इन सब चीजों को होने भी नहीं देता, जिससे पब्लिक हमेशा परेशान होती है और शिकायत भी करती है पर नतीजा शिफर ही रहता है।
खैर इन सब मुद्दों के अलावा हम ये जानना चाहते हैं कि ये तमाम ब्रांडस के नहाने के साबुन हमारे शरीर के Micro-flora के लिए कितने सही व गलत हैं। क्योंकि हमारे शरीर में अलग अलग जगहों पर विभिन्न प्रकारों के सूक्ष्म जीवों की भरमार है, जो कि हमारे शरीर के स्वास्थ्य का ध्यान रखते हैं। नवजातों से लेकर बच्चों, युवाओं, तथा नोजवानों एवं वृद्धावस्था में भी साबुन का उपयोग उनके शरीर के रसायनों में परिवर्तन करने के साथ साथ तथा घटक ऐलर्जी पैदा कर सकते हैं।
आज हम Microbiological Study के
आधार पर इस बात की शोधपरक पड़ताल करेंगे कि यह तमाम साबुन हमारे लिए कितने जरूरी है और कितने ही यह हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक अथवा नुकसानदायक हैं। आइए इसे हम बिन्दुवार विभिन्न तथ्यों के आधार पर समझने की कोशिश करेंगे।
🧬 Microbiome पर
“The human body is not just human; it is a complex ecosystem.”— Dr. Martin Blaser (Microbiome Researcher)
“Not all microbes are enemies; many are essential partners in health.”— NIH Microbiome Project
यह प्रश्न साबुन, बाज़ारू दावों और मानव शरीर के Micro-flora (Skin Microbiome) के संबंध को लेकर बहुत ही रोचक, महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक दृष्टि से प्रासंगिक है। यहाँ सबसे पहले हम ये जानेंगे कि मानव शरीर का माइक्रो-फ़्लोरा आखिर है क्या?
मानव शरीर का Micro-flora (Skin Microbiome) क्या है?
अध्ययन के आधार हम ये कह सकते हैं कि मानव त्वचा पर खरबों सूक्ष्मजीव (Microorganisms) रहते हैं, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
Bacteria
Staphylococcus epidermidis
Cutibacterium acnes
Fungi (खमीर/फंगस)
Malassezia प्रजातियाँ
Viruses & Mites (बहुत सीमित मात्रा में)
ये सूक्ष्मजीव रोगजनक जीवों से मुकाबला करते हैं तथा त्वचा की इम्यूनिटी को प्रशिक्षित करते हैं, और त्वचा की नमी, pH और barrier function बनाए रखते हैं। इसी संतुलन को Eubiosis कहा जाता है। जब यह बिगड़ता है, तो Dysbiosis होती है।
साबुन का त्वचा के Micro-flora पर सीधा प्रभाव
(A) पारंपरिक साबुन (Conventional Soaps)
अधिकांश आम साबुन: 9 से 10 pH के होते हैं और डिटर्जन्ट बेस्ड होते हैं तथा Strong degreasing action रखते हैं। इसके Microbiological प्रभाव के तहत लाभकारी बैक्टीरिया भी नष्ट हो जाते हैं। साथ ही Acid mantle (त्वचा का प्राकृतिक pH ≈ 4.5–5.5) टूटता है और Opportunistic pathogens को बढ़ने का मौका मिलता है।
तथ्य: Clinical studies में पाया गया है कि: बार-बार alkaline साबुन उपयोग से Eczema, Acne, Fungal infections का खतरा बढ़ता है।
(B) Antibacterial साबुन (जैसे Triclosan युक्त)
ऐसे कई ब्रांड हैं जो “99.9% germs kill” का दावा करते हैं। लेकिन Microbiological तथ्य कहते हैं कि ये साबुन Non-selective killing करते हैं तथा Good bacteria और bad bacteria में फर्क नहीं करते और इनसे Microbial resistance भी विकसित हो सकती है।
Journal of Antimicrobial Chemotherapy में प्रकाशित शोध के अनुसार:
Antibacterial soaps से Skin microbiome diversity घटती है, जिससे long-term immunity कमजोर हो सकती है।
(C) Herbal / Ayurvedic साबुन
नीम, तुलसी, चंदन, हल्दी आदि युक्त साबुन।
सकारात्मक पक्ष: कुछ जड़ी-बूटियों में mild antimicrobial गुण होते हैं तथा कम हानिकारक (यदि pH संतुलित हो)
नकारात्मक पक्ष: “Herbal” का मतलब हमेशा “Safe” नहीं होता है और Essential oils अधिक मात्रा में हों तो irritation भी होने लगता है। साथ ही इनमें Standardization की कमी (भारत में बड़ी समस्या) भी होती है।
शरीर के अलग-अलग हिस्सों में Micro-flora का अंतर
फ्लोरिडा अटलांटिक विश्वविद्यालय एवं वेलिंगटन मेडिकल रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों के अनुसार बैक्टीरिया ऐसे अत्यंत सूक्ष्म और एक कोशिकीय जीव हैं जो कि पृथ्वी पर सबसे पहले ज्ञात जीवन रूपों में से एक हैं। पृथ्वी पर लाखों विभिन्न प्रकार के ज्ञात और अज्ञात बैक्टीरिया हैं जो कि पूरी दुनिया में हर संभव वातावरण में रहते हैं। वे मिट्टी, समुद्री जल और पृथ्वी की पपड़ी के भीतर गहराई में रहते हैं। कुछ बैक्टीरिया के रेडियोएक्टिव कचरे में भी रहने के दृष्टांत देखे गए हैं। कई बैक्टीरिया लोगों और जानवरों के शरीर पर और उनमें रहते हैं—त्वचा पर और वायुमार्ग में, मुंह और पाचन केंद्र में, प्रजनन और पेशाब पथ में होते हैं, लेकिन कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। ऐसे बैक्टीरिया को रेजिडेंट फ्लोरा कहा जाता है। हमारे आसपास की वनस्पतियों में उतने बैक्टीरिया तो होते ही हैं जितनी हमारे शरीर में कोशिकाएं होती हैं।
बहुत से रेजिडेंट फ्लोरा समूह वास्तव में लोगों के लिए सहायक होते हैं—उदाहरण के लिए, खाना पचाने में मदद करके या अन्य अधिक खतरनाक सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोककर।केवल कुछ प्रकार के बैक्टीरिया आमतौर पर सक्रिय बीमारी से जुड़े होते हैं और उन्हें रोगजनकों के रूप में जाना जाता है। कभी-कभी, कुछ स्थितियों में, रेजिडेंट फ्लोरा वनस्पति रोगजनकों के रूप में कार्य कर सकते हैं और सक्रिय बीमारी का कारण बन सकते हैं। कुछ बैक्टीरिया सूजन को ट्रिगर कर सकते हैं जो हृदय, फेफड़े, तंत्रिका तंत्र, किडनी या गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल मार्ग को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकते हैं। कुछ बैक्टीरिया (जैसे हैलिकोबैक्टर पायलोरी) कैंसर के खतरे को बढ़ाते हैं।